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'SIR प्रक्रिया पूरी तरह से वैधानिक, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव EC का संवैधानिक दायित्व', पढ़ें सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की अहम बातें

 Reported By: Atul Bhatia, Edited By: Vinay Trivedi
 Published : May 27, 2026 09:01 am IST,  Updated : May 27, 2026 12:41 pm IST

चुनाव आयोग के SIR करने के अधिकार पर Supreme Court ने आज फैसला सुनाया है। सर्वोच्च अदालत ने तय कर दिया कि चुनाव आयोग को संविधान और जनप्रतिनिधित्व कानून के अंतर्गत SIR करने का अधिकार है।

Supreme Court SIR hearing- India TV Hindi
SIR पर आज आएगा सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला। Image Source : PTI (प्रतीकात्मक फोटो)

सुप्रीम कोर्ट ने SIR की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर आज (बुधवार को) अहम फैसला सुनाया। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने याचिकाओं के एक बैच पर ये फैसला सुनाया। सर्वोच्च अदालत ने ये तय किया कि क्या चुनाव आयोग के पास मौजूदा रूप में SIR करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 326, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और उसके तहत बनाए गए नियमों के तहत शक्तियां हैं। इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से ‘संदिग्ध नागरिकता’ के आधार पर हटाए गए हैं, उनकी सूची 4 हफ्तों के भीतर केंद्र सरकार को भेजी जाए। इस आर्टिकल में सुप्रीम कोर्ट के फैसले की महत्वपूर्ण बातें पढ़ें।

वोटर लिस्ट अपडेट करना स्वतंत्र-निष्पक्ष चुनाव का हिस्सा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह कहना गलत है कि SIR कराकर चुनाव आयोग ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम किया है। मतदाता सूची को अपडेट करना स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव का हिस्सा है। ये आयोग का संवैधानिक दायित्व है। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर SIR की कार्रवाई को कानून के खिलाफ नहीं कहा जा सकता कि इसकी प्रक्रिया सामान्य वोटर वेरिफिकेशन प्रक्रिया से भिन्न है।

दस्तावेज मांगने का मतलब उन्हें नागरिक ना मानना नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि SIR की प्रकिया में कोई गलती नहीं है। लोगों को अपनी जानकारी जोड़ने, सुधार करने और आपत्ति/अपील करने के कई मौके दिए गए। अगर मतदाताओं से SIR के दौरान अपने दस्तावेज या जानकारी देने के लिए कहा जाता है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि उनको नागरिक नहीं माना जा रहा है। निष्पक्ष चुनाव सिर्फ वोट डालने की प्रक्रिया तक सीमित नहीं होते। उनका सबसे महत्वपूर्ण आधार सही, भरोसेमंद और सटीक वोटर लिस्ट होती है। ऐसे में वोटर लिस्ट को अपडेट करना गलत नहीं माना जा सकता।

मतदाता सूची के पुनरीक्षण और संशोधन का अधिकार है EC के पास

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग को Representation of the People Act, 1950 की धारा 16 के तहत मतदाता सूची के पुनरीक्षण और संशोधन का अधिकार प्राप्त है। मतदाता सूची से नाम जोड़ने या हटाने की पूरी प्रक्रिया न्यायिक समीक्षा के दायरे में आती है। अगर मौजूद दस्तावेजों से किसी की नागरिकता पर शक होता है तो चुनाव आयोग नाम मतदाता सूची से हटाने की कार्रवाई कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने SIR के नियमों को बताया वाजिब

सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि SIR के नियमों में जो व्यवस्था है, वो वाजिब है। नोटिस देना, जानकारी सार्वजनिक करना, जिन मामलों में शक हो उनकी व्यक्तिगत जांच करना और अपील का अधिकार देना- ये सभी मिलकर इस निष्पक्षता की शर्त को पूरा करते हैं। SIR में जो दस्तावेजों की सूची बनाई गई है, वो आमतौर पर लोगों के पास आसानी से होते हैं। पहले की तुलना में इस सूची को और बढ़ाया भी गया है, ताकि ज्यादा दस्तावेज स्वीकार किए जा सकें, न कि उन्हें सीमित किया जाए। यह कहना कि SIR की व्यवस्था लोगों को वोटर लिस्ट बाहर करने वाली है, सही नहीं है।

मतदाता सूची से तय नहीं होती नागरिकता

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग को वोटर लिस्ट सुधारने के दौरान यह जांच करने का अधिकार है कि किसी व्यक्ति की नागरिकता से जुड़े सवाल क्या हैं। हालांकि, इस जांच का मकसद केवल यह है कि किसी व्यक्ति का नाम वोटर लिस्ट में रखा जाए या हटाया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि चुनाव आयोग का काम सिर्फ मतदाता सूची की शुद्धता से जुड़ा हुआ है। नागरिकता तय करना चुनाव आयोग का काम नहीं है। लेकिन कौन नागरिक रहेगा या नहीं, ये मतदाता सूची से तय नहीं होता है।

29 जनवरी को सुरक्षित रखा गया था फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में 29 जनवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। कोर्ट की तरफ से SIR प्रक्रिया पर कोई रोक नहीं लगाई गई है और यह प्रक्रिया बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल में पूरी हो चुकी है। यूपी, गुजरात और राजस्थान जैसे कई राज्यों में ये अभी जारी है।

याचिकाकर्ताओं में अलग-अलग पार्टियों के सांसद शामिल

इनमें से ज्यादातर याचिकाएं जून, 2025 में चुनाव आयोग की तरफ से बिहार में SIR करने के फैसले के बाद दाखिल की गई थीं। इनमें द एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स, पॉलिटिकल एक्टिविस्ट योगेंद्र यादव, टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा, आरजेडी सांसद मनोज झा, कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल, एनसीपी एसपी सांसद सुप्रिया सुले और अन्य याचिकाकर्ताओं का नाम शामिल है।

सुनवाई के दौरान आधार कार्ड पर दिया था अहम निर्देश

सुनवाई के दौरान पिछले साल, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया था कि वह आधार कार्ड को '12वें दस्तावेज' के रूप में माने, जिसको बिहार की संशोधित वोटर लिस्ट में शामिल होने के लिए पहचान प्रमाण के तौर पर पेश किया जा सकता है। हालांकि, सर्वोच्च अदालत ने ये साफ किया था कि आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं होगा। चुनाव आयोग के अधिकारी मतदाताओं की तरफ से पेश किए गए आधार कार्ड की प्रामाणिकता और वास्तविकता की जांच कर सकते हैं।

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